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मौद्रिक नीति समिति की 3 से 5 अगस्त 2026 के दौरान हुई बैठक का कार्यवृत्त

19 अगस्त 2026

मौद्रिक नीति समिति की 3 से 5 अगस्त 2026 के दौरान हुई बैठक का कार्यवृत्त
[भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडएल के अंतर्गत]

भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडबी के अंतर्गत गठित मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बासठवीं बैठक 3 से 5 अगस्त 2026 के दौरान आयोजित की गई थी।

2. बैठक की अध्यक्षता श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर ने की तथा सभी सदस्य – डॉ. नागेश कुमार, निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक, इंस्टिट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट, नई दिल्ली; श्री सौगत भट्टाचार्य, अर्थशास्त्री, मुंबई; प्रोफेसर राम सिंह, निदेशक, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, दिल्ली; डॉ. पूनम गुप्ता, मौद्रिक नीति की प्रभारी उप गवर्नर और श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य, कार्यपालक निदेशक (भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडबी(2)(सी) के अंतर्गत केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित रिज़र्व बैंक के अधिकारी) इसमें उपस्थित रहें।

3. भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ज़ेडएल के अनुसार, रिज़र्व बैंक मौद्रिक नीति समिति की प्रत्येक बैठक के चौदहवें दिन इस बैठक की कार्यवाहियों का कार्यवृत्त प्रकाशित करेगा, जिसमें निम्नलिखित शामिल होगा:

ए) मौद्रिक नीति समिति की बैठक में अपनाया गया संकल्प;

बी) मौद्रिक नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का वोट, जो उक्त बैठक में अपनाए गए संकल्प पर उस सदस्य द्वारा दिया जाएगा; और

सी) उक्त बैठक में अपनाए गए संकल्प पर धारा 45ज़ेडआई की उप-धारा (11) के अंतर्गत मौद्रिक नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का वक्तव्य।

4. वैश्विक और घरेलू संदर्भ में हो रहे घटनाक्रमों को देखते हुए, एमपीसी ने स्टाफ के समष्टि-आर्थिक अनुमानों की विस्तार से समीक्षा की, जिसमें सर्वेक्षण परिणामों और हितधारकों के साथ परामर्श से प्राप्त निविष्टि शामिल थे। एमपीसी ने संभावना के विभिन्न जोखिमों से जुड़े वैकल्पिक परिदृश्यों की भी समीक्षा की। उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए और मौद्रिक नीति के रुख पर विस्तृत चर्चा के बाद, एमपीसी ने संकल्प अपनाया जिसे नीचे प्रस्तुत किया गया है।

संकल्प

5. श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक की अध्यक्षता में मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 62वीं बैठक 3 से 5 अगस्त 2026 तक आयोजित की गई। बैठक में एमपीसी के सदस्य डॉ. नागेश कुमार, श्री सौगत भट्टाचार्य, प्रो. राम सिंह, डॉ. पूनम गुप्ता और श्री इंद्रनील भट्टाचार्य ने भाग लिया।

6. उभरते समष्टि-आर्थिक और वित्तीय घटनाक्रमों तथा संभावना का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद, एमपीसी ने सर्वसम्मति से चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5.00 प्रतिशत, तथा सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) दर और बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर बनी रहेगी। एमपीसी ने तटस्थ रुख बनाए रखने का भी निर्णय लिया।

संवृद्धि और मुद्रास्फीति संभावना

वैश्विक संभावना

7. वर्ष 2026 के वैश्विक आर्थिक संभावना में अब तक बाज़ार में भारी और बार-बार होने वाले उतार-चढ़ाव, मुद्रास्फीति संबंधी सतत चिंताएँ और नीतिगत प्रत्याशाओं में बदलाव देखने को मिले हैं। जुलाई में संघर्ष के फिर से शुरू होने के बीच पश्चिम एशिया में अस्थायी युद्धविराम से मिली राहत जल्दी ही समाप्त हो गई। सतत मुद्रास्फीति के कारण कई केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ा दी हैं, जबकि अन्य सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। उच्च प्रतिफल, फेडरल रिज़र्व के सख्त रुख और एआई-परिचालित उत्पादकता लाभ से मजबूत हुई अमेरिकी अर्थव्यवस्था के समर्थन से अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ। निवेशकों द्वारा एआई-संबंधी शेयरों में अपने निवेश का पुनर्मूल्यन करने के कारण वैश्विक शेयर बाजार में अस्थिरता बनी रही। पश्चिम एशिया में संघर्ष, अस्थिर तेल की कीमतें, मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं के लंबे समय तक बने रहने के अनुमान और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की कमजोर सार्वजनिक वित्त व्यवस्था संभावना के लिए महत्वपूर्ण अधोगामी जोखिम पैदा करते हैं।

घरेलू संभावना

8. निरंतर वैश्विक बाधाओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ बनी हुई है। अब तक उपलब्ध उच्च-आवृत्ति संकेतक 2026-27 की पहली तिमाही में स्थिर घरेलू मांग की ओर इशारा करते हैं। निजी उपभोग मजबूत बना रहा। निर्माण, पूंजीगत वस्तुओं और बैंक ऋण से संबंधित विभिन्न संकेतकों से पता चलता है कि निवेश भी आघात-सह बना हुआ है। बाहरी मांग भी बनी रही, क्योंकि सेवाओं के निर्यात में अच्छी वृद्धि के साथ-साथ पण्य निर्यात में भी सुधार हुआ।

9. आगे चलकर, अस्थिर वैश्विक आर्थिक माहौल का घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर कुछ प्रभाव पड़ने की संभावना है। ऊर्जा की कीमतें और आपूर्ति शृंखला का दबाव अभी भी उच्च और अनिश्चित बने हुए हैं। आपूर्ति-पक्ष के विभिन्न उपायों के माध्यम से इसके प्रतिकूल प्रभाव को नियंत्रित किया जा रहा है। यद्यपि स्थिति अभी भी परिवर्तनशील है, फिर भी अल नीनो की परिस्थितियों के बीच कम और असमान दक्षिण-पश्चिम मानसून, कृषि क्षेत्र की संभावना और ग्रामीण मांग के लिए कुछ जोखिम उत्पन्न करती है। फिर भी, सरकार द्वारा अन्य के साथ-साथ फसल विविधीकरण, अल्पकालिक और जलवायु-अनुकूल फसलों सहित, जल संचयन और संरक्षण से इस प्रभाव को कम करने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, सेवाओं में निरंतर गति, जीएसटी युक्तिकरण के निरंतर प्रभाव और मोटे तौर पर रोजगार की स्थिर स्थिति से शहरी मांग को समर्थन मिलना जारी रहना चाहिए। उच्च क्षमता उपयोग, मजबूत ऋण प्रवाह और बुनियादी ढांचे पर सरकार के निरंतर बल से निवेश गतिविधि को बनाए रखने की उम्मीद है। जहाँ सेवा निर्यात के बने रहने की उम्मीद है, वहीं हालिया व्यापार करार और विविधीकरण पर जोर से वस्तु निर्यात को समर्थन मिलेगा।

10. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जोकि पहली तिमाही में 7.0 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.4 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.5 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है। 2027-28 की पहली तिमाही के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है (चार्ट 1)। जोखिम समान रूप से संतुलित हैं।

11. लगातार 16 महीनों तक लक्ष्य से नीचे रहने के बाद, जून 2026 में सीपीआई मुद्रास्फीति बढ़कर 4.4 प्रतिशत हो गई, लेकिन यह 2026-27 की पहली तिमाही के लिए पहले के अनुमान से 30 आधार अंक कम रही। जून में यह वृद्धि मुख्य रूप से खाद्य और ईंधन की उच्च मुद्रास्फीति के कारण हुई। खाद्य मुद्रास्फीति में यह वृद्धि वैविध्यपूर्ण थी, जिसमें मई-जून के दौरान अधिकांश घटकों में कीमतों का दबाव देखा गया। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में भारी उछाल के बाद, खुदरा कीमतों में संशोधन के कारण ईंधन मुद्रास्फीति भी बढ़ गई। इसके परिणामस्वरूप रेस्तरां के शुल्कों जैसी चुनिंदा श्रेणियों में भी मुद्रास्फीति बढ़ी। उच्च इनपुट लागत के दबाव के बावजूद, मई-जून के दौरान मूल (खाद्य और ईंधन को छोड़कर सीपीआई) मुद्रास्फीति 3.9 प्रतिशत पर यथावत् रही। कीमती धातुओं को छोड़कर, इस अवधि के दौरान मूल मुद्रास्फीति और भी कम, 2.3-2.5 प्रतिशत रही।

12. आगे चलकर, वर्षा के स्थानिक और कालिक वितरण पर अल नीनो का प्रभाव एक जोखिम बना रहेगा, हालाँकि सक्रिय आपूर्ति प्रबंधन और खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण वैश्विक तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव बना हुआ है, जिससे निकट अवधि की संभावना असपष्ट हो गई है। हालाँकि अब तक सामान्य मुद्रास्फीति का दबाव सीमित है, लेकिन खाद्य, ईंधन और अन्य लागतों के बढ़ने से मुद्रास्फीति में व्यापक वृद्धि होने का जोखिम अभी भी बना हुआ है।

13. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति 5.0 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जोकि दूसरी तिमाही के लिए 4.7 प्रतिशत, तीसरी तिमाही के लिए 5.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही के लिए 5.5 प्रतिशत अनुमानित है। 2027-28 की पहली तिमाही के लिए मुद्रास्फीति 5.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें जोखिम समान रूप से संतुलित हैं (चार्ट 2)। 2026-27 के लिए मूल मुद्रास्फीति 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। कीमती धातुओं को छोड़कर, निकट अवधि में मूल मुद्रास्फीति के कम रहने की उम्मीद है, जो यह दर्शाता है कि मांग का दबाव सीमित है।

मौद्रिक नीति के निर्णयों का औचित्य

14. जैसा कि अनुमान था, हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति लक्ष्य से थोड़ा ऊपर पहुंच गई। हालांकि, पहली तिमाही की वास्तविक मुद्रास्फीति, अनुमानों से थोड़ी कम रही, जो लागत के दबावों के सीमित प्रभाव-प्रसार को दर्शाती है। उच्च मुद्रास्फीति मुख्य रूप से ईंधन और खाद्य पदार्थों के कारण है, जिसमें अब तक कीमतों के दबाव के व्यापक होने के बहुत कम संकेत हैं। कीमती धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति अभी भी अनुकूल बनी हुई है। पूर्वानुमान के अनुरूप, हेडलाइन मुद्रास्फीति निकट भविष्य में और बढ़ने और मुख्यतः खाद्य एवं ईंधन की कीमतों में वृद्धि के कारण, 2026-27 की तीसरी तिमाही में शिखर पर पहुंचने की संभावना है, जिसके बाद इसमें कमी आएगी। कीमती धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति द्वारा परिलक्षित अंतर्निहित मुद्रास्फीति, जो कुछ समय से सौम्य रही है, वित्तीय वर्ष के अंत तक मूल मुद्रास्फीति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की संभावना है।

15. आघात-सह घरेलू मांग, विनिर्माण और सेवा गतिविधियों में निरंतर विस्तार, और मजबूत निर्यात से संवृद्धि को समर्थन मिलना जारी है, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की स्थिति की पुष्टि करता है।

16. संक्षेप में, हालांकि हेडलाइन मुद्रास्फीति के बढ़ने का अनुमान है, लेकिन यह मुख्य रूप से खाद्य और ईंधन की आपूर्ति के दबाव के कारण है; यह व्यापक नहीं हो रही है; मूल मुद्रास्फीति मध्यम बनी हुई है और तीसरी तिमाही में अपने चरम पर पहुंचने के बाद इसके कम होने की उम्मीद है। संवृद्धि, हालांकि आघात-सह है, 2026-27 में कम रहने का अनुमान है। हालाँकि, दक्षिण-पश्चिम मानसून, अल नीनो, भू-राजनीति और वैश्विक व्यापार नीति को लेकर अनिश्चितताओं के कारण संभावना अस्पष्ट बनी हुई है। कोई भी नीतिगत कदम उठाने से पहले, विशेष रूप से मुद्रास्फीति, इसकी दिशा और संरचना के संबंध में अधिक स्पष्टता आने की आवश्यकता है। ऐसे किसी भी कदम में उभरते हुए संवृद्धि-मुद्रास्फीति के रुझानों के अनुरूप नीतिगत दरों को फिर से विचार करने की आवश्यकता होगी, विशेष रूप से अब तक के इसके सामान्य स्तरों से अंतर्निहित मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण को देखते हुए।

17. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, एमपीसी ने नीतिगत दर को यथावत् रखने के लिए वोट किया। एमपीसी ने समष्टि-आर्थिक गतिविधियों के अनुरूप उचित कदम उठाने के लिए तटस्थ रुख बनाए रखने का भी निर्णय लिया। एमपीसी ने इस बात पर जोर दिया कि वह कड़ी निगरानी रखेगी और मुद्रास्फीति को लक्ष्य के अनुरूप रखने की अपनी प्रतिबद्धता पर दृढ़ रहेगी।

18. एमपीसी की बैठक का कार्यवृत्त 19 अगस्त 2026 को प्रकाशित की जाएगी।

19. एमपीसी की अगली बैठक 5 से 7 अक्तूबर 2026 के दौरान निर्धारित है।

नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने के संकल्प पर वोटिंग

सदस्य वोट
डॉ. नागेश कुमार हाँ
श्री सौगत भट्टाचार्य हाँ
प्रो. राम सिंह हाँ
श्री इन्द्रनील भट्टाचार्य हाँ
डॉ पूनम गुप्ता हाँ
श्री संजय मल्होत्रा हाँ

डॉ नागेश कुमार का वक्तव्य

20. भारतीय अर्थव्यवस्था ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, विशेषकर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, व्यापार नीति संबंधी अनिश्चितताओं तथा एल नीनो के कारण उत्पन्न कृषि जोखिमों जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उल्लेखनीय आघात-सहनीयता प्रदर्शित की है। मौजूदा वर्ष के लिए उपलब्ध प्रारंभिक संकेतक इस तथ्य की पुष्टि करते हैं।

21. यद्यपि मानसून की अनुमानित कमी के कारण कृषि क्षेत्र के जीवीए की वृद्धि कम होने की संभावना है, तथापि क्षमता उपयोग दर में वृद्धि, उद्योग क्षेत्र को सुदृढ़ ऋण प्रवाह, निजी उपभोग में मजबूती तथा सरकार द्वारा पूंजीगत व्यय को अग्रिम रूप से बढ़ाए जाने सहित अन्य रुझान एवं संकेतक वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में निवेश गतिविधियों में तेजी का संकेत देते हैं। सेवा तथा विनिर्माण क्षेत्र के निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। समग्रतः, भारतीय रिज़र्व बैंक ने वर्ष 2026-27 के लिए संवृद्धि का अनुमान जून की मौद्रिक नीति बैठक में किए गए 6.6 प्रतिशत से 10 आधार अंक बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है।

22. मुद्रास्फीति के संदर्भ में, यद्यपि जून 2026 में हेडलाइन मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत रही, तथापि 3.9 प्रतिशत की मूल मुद्रास्फीति से यह स्पष्ट होता है कि मुद्रास्फीति मुख्यतः आपूर्ति-पक्षीय कारकों से प्रेरित है तथा अर्थव्यवस्था में अत्यधिक मांगजनित दबाव के कोई संकेत नहीं हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक ने वर्ष 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति का अनुमान जून की मौद्रिक नीति में व्यक्त 5.1 प्रतिशत से 10 आधार अंक घटाकर 5.0 प्रतिशत कर दिया है।

23. भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि तथा मुद्रास्फीति संभावना में हुआ यह सीमित सुधार किसी भी प्रकार की आत्मसंतुष्टि का आधार नहीं होना चाहिए। सबसे पहले, एल नीनो के प्रभाव के कारण कृषि क्षेत्र की संभावना अभी भी अनिश्चित बनी हुई है, यद्यपि जुलाई में देश के अनेक भागों में मानसून की अल्पता में कुछ कमी आई है। संभावित वर्षा-अभाव के प्रभावों को कम करने के लिए सरकार अल्पावधि फसलों तथा जलवायु-अनुकूल फसलों को प्रोत्साहित करते हुए फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है।

24. पश्चिम एशिया में संघर्ष तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य में अवरोध से उत्पन्न चिंताएँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं, यद्यपि भारत ने आपूर्ति स्रोतों में विविधीकरण के माध्यम से स्थिति से निपटने के प्रयास किए हैं। व्यापार नीति संबंधी अनिश्चितताएँ और अधिक बढ़ गई हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने कथित बंधुआ श्रम के उपयोग के आधार पर भारतीय निर्यात पर एमएफ़एन शुल्क के अलावा 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया है, जो कुछ अन्य देशों पर लगाए गए 12.5 प्रतिशत शुल्क से थोड़ा कम प्रतीत हो सकता है। इसके अलावा, अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के आधार पर भारत सहित कुछ देशों के विरुद्ध एक अन्य एस.301 जाँच भी चल रही है। सामान्य औषधियों के आयात पर वर्ष 2028 से 100 प्रतिशत तथा वर्ष 2029 से 200 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया है। चूँकि संयुक्त राज्य अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है, जहाँ भारत के कुल निर्यात का लगभग पाँचवाँ भाग तथा वस्त्र एवं परिधान जैसे श्रम-प्रधान निर्यात का लगभग एक-तिहाई जाता है, इसलिए यह अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने निर्यात बाज़ारों में शीघ्र विविधीकरण लाए। इस संदर्भ में यूरोपीय देशों के साथ भारत के एफ़टीए का संपन्न होना एक सकारात्मक घटना-क्रम है। ईएफ़टीए देशों तथा यूनाइटेड किंगडम के साथ उक्त करार पहले ही प्रभावी हो चुके हैं तथा यूरोपीय संघ के साथ 27 जनवरी 2026 को हस्ताक्षरित करार वर्ष 2026 के अंत तक प्रभावी होने की संभावना है। ये करार विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों के निर्यात को प्रोत्साहन देंगे तथा पहली बार यूरोपीय बाज़ारों में वियतनाम और बांग्लादेश के समकक्ष प्रतिस्पर्धात्मक अवसर उपलब्ध कराते हुए भारत के निर्यात विविधीकरण में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

25. अतः अत्यधिक अनिश्चित वैश्विक आर्थिक परिवेश में हमें अत्यंत सतर्क रहना होगा तथा उभरते भू-राजनीतिक, व्यापार नीति तथा मानसून संबंधी जोखिमों एवं उनके भारतीय अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभावों पर निरंतर दृष्टि रखनी होगी। वर्तमान परिस्थितियों में मौद्रिक नीति में किसी परिवर्तन की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। इसलिए, मैं नीतिगत रेपो दर को यथावत रखने के पक्ष में वोट करता हूँ। साथ ही, मेरा मत है कि ऐसी अनिश्चित परिस्थितियों में तटस्थ मौद्रिक नीति रुख उपयुक्त रहेगा।

श्री सौगत भट्टाचार्य का वक्तव्य

26. फरवरी 2026 के उत्तरार्द्ध में पश्चिम एशिया में संघर्ष प्रारंभ होने के बाद से जोखिमों का स्वरूप और उनका संतुलन निरंतर परिवर्तित होता रहा है तथा इसी के साथ अन्य अनिश्चितताएं भी बढ़ती गईं हैं। वर्ष 2026 की अब तक की स्थिति के अनुसार वैश्विक आर्थिक संभावना में तीव्र एवं बार-बार होने वाले वित्तीय बाज़ार उतार-चढ़ाव, सतत रूप से विद्यमान मुद्रास्फीति संबंधी चिंताएं तथा नीतिगत अपेक्षाओं में परिवर्तन बने हुए हैं।

27. जून 2026 की मौद्रिक नीति समिति की समीक्षा के बाद 60-दिवसीय समझौता ज्ञापन के परिणामस्वरूप युद्धविराम की जो अपेक्षाएँ थीं, वे पूरी नहीं हो सकीं। विकसित तथा उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंकों की नीतिगत कार्रवाइयों में भिन्नता रही है, किंतु उन्होंने सतर्कता बरतते हुए अधिकांशतः "वेट एंड वॉच" की नीति अपनाई है।

28. भारत में भी मुद्रास्फीति तथा संवृद्धि की गतिशीलता अनिश्चित बनी हुई है, यद्यपि जून 2026 की समीक्षा में किए गए अनुमानों की तुलना में स्थिति कुछ बेहतर प्रतीत होती है।

  1. वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि का अनुमान 6.7 प्रतिशत तथा सीपीआई मुद्रास्फीति का अनुमान 5.0 प्रतिशत रखा गया है। संवृद्धि संबंधी अनुमानों को उच्च आवृत्ति वाले सुदृढ़ संकेतकों का समर्थन प्राप्त है। तथापि, मुद्रास्फीति के संबंध में सावधानी अपेक्षित है। ईंधन की उच्च कीमतों के बने रहने से उच्च निविष्टि लागत का विस्तार- प्रभाव उपभोक्ता मूल्यों में अंतरित हो सकता है, जिससे मुद्रास्फीति के द्वितीय चरण के आने की संभावना बनती है। परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। इसके अतिरिक्त, घरेलू मुद्रास्फीति प्रत्याशाएँ अभी भी उच्च स्तर पर बनी हुई हैं, जो आगे चलकर तृतीय चरण के मूल्य-दबाव उत्पन्न कर सकती हैं।

  2. वित्तीय परिस्थितियाँ अभी भी अपेक्षाकृत कड़ी बनी हुई हैं, यद्यपि जून 2026 के वक्तव्य में विदेशी जमा एवं पूंजी आकर्षित करने हेतु घोषित अतिरिक्त उपायों के बाद इनमें कुछ नरमी आई है। बैंकों तथा एनबीएफ़सी द्वारा उद्योग, अवसंरचना और सेवा क्षेत्रों को दिया गया ऋण अधिकांश क्षेत्रों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के साथ-साथ मध्यम एवं बड़े निगमों में सुदृढ़ बना हुआ है। कॉरपोरेट क्षेत्र में संसाधनों का समग्र प्रवाह भी आघात-सह बना हुआ है।

  3. बाह्य क्षेत्र के संदर्भ में, वैश्विक अनिश्चितता केवल भू-राजनीतिक परिस्थितियों से ही नहीं, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्कों तथा अन्य प्रस्तावित दंडात्मक उपायों से संबंधित निरंतर बदलती परिस्थितियों से भी उत्पन्न हो रही है। इसका प्रभाव चालू खाते तथा पूंजी खाते—दोनों पर पड़ रहा है। तथापि, अप्रैल और मई के दौरान भारत का चालू खाता घाटा समुत्थानशील स्तरों पर बना हुआ है।

29. उपर्युक्त कारकों के समग्र मूल्यांकन में यह अपेक्षित है कि नीतिगत कार्रवाई की लागतों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। इस संदर्भ में, समयपूर्व मौद्रिक सख्ती के आर्थिक लागत का आकलन, मुद्रास्फीति के स्थायी स्वरूप ग्रहण कर लेने के जोखिम के साथ किया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसी स्थिति में मुद्रास्फीति को निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप लाने हेतु भविष्य में और अधिक आक्रामक मौद्रिक सख्ती की आवश्यकता पड़ सकती है। तथापि, पिछले कुछ दशकों के दौरान वैश्विक एवं घरेलू समष्टि आर्थिक तथा वित्तीय अनुभवों के अनेक तुलनात्मक अध्ययनों के आधार पर भी वर्तमान नीतिगत निर्णयों का मार्गदर्शन करने हेतु पर्याप्त अनुभवजन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। अतः मेरा मत है कि अगली नीतिगत कार्रवाई से पूर्व समग्र मांग में और अधिक वृद्धि तथा मूल्य-दबावों के व्यापक होने के स्पष्ट प्रमाणों की प्रतीक्षा करना उपयुक्त होगा। इसके अतिरिक्त, वास्तविक ब्याज दरों के स्तर पर भी सतत निगरानी बनाए रखना आवश्यक है।

30. यद्यपि यह सतर्क दृष्टिकोण आवश्यक है, तथापि आधारभूत मुद्रास्फीति के पूर्ववर्ती सौम्य स्तरों से क्रमिक सामान्यीकरण के अनुमान को देखते हुए संवृद्धि- मुद्रास्फीति की गतिशीलता पर निकट एवं सतत निगरानी रखना आवश्यक होगा, ताकि उपयुक्त समय पर नीतिगत दर का पुनर्समायोजन किया जा सके।

31. उपर्युक्त तर्कों के आधार पर, मैं इस बैठक में नीतिगत रेपो दर को अपरिवर्तित रखने के पक्ष में वोट करता हूँ। साथ ही, समष्टि- वित्तीय परिवेश की परिवर्तनशीलता को ध्यान में रखते हुए तटस्थ मौद्रिक नीति रुख को बनाए रखना उपयुक्त भी होगा।

प्रो. राम सिंह का वक्तव्य

32. पिछली एमपीसी बैठक के बाद से आर्थिक बाधाओं में बहुत कम बदलाव आया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में निरंतर मुद्रास्फीति का दबाव, अस्थिर वित्तीय बाज़ार और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बाजारों तथा केंद्रीय बैंकों से मौद्रिक सख्ती के संकेत जैसे जटिल हालात बने हुए हैं। पश्चिम एशिया के संघर्ष के कारण कच्चे तेल और इसके उप-उत्पादों पर ऊर्ध्वगामी दबाव बना रहा।1 अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व के सामने सेवा क्षेत्र में निरंतर बढ़ती मुद्रास्फीति और मिश्रित श्रम बाज़ार की चुनौतियाँ है, जिसके कारण ब्याज दरें घटने की उम्मीदें और अनिश्चित हो गई हैं। घरेलू आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए मुद्रास्फीति और संवृद्धि, दोनों मोर्चों पर कड़ी नज़र रखने की आवश्यकता है।

33. जून 2026 की स्थिति के अनुसार, ईंधन मुद्रास्फीति सौम्य बनी रही है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल का घरेलू खुदरा कीमतों पर सीमित प्रभाव- अंतरण हुआ है। सीपीआई मुद्रास्फीति 4% के लक्ष्य को मामूली अंतर से पार कर गई है। हालाँकि, मूल मुद्रास्फीति अभी भी 4% से नीचे थी। कीमती धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति 2.5 प्रतिशत पर काफी कम बनी रही। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि पिछले दो तिमाहियों में अर्थव्यवस्था को जिन व्यापारिक आघातों (कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल और रुपये के कमजोर होने के कारण) का सामना करना पड़ा है, उनका प्रभाव-अंतरण अब तक सीमित रहा है।

34. आगे चलकर, आरबीआई और वित्त मंत्रालय द्वारा 5 जून को घोषित संयुक्त सुधार पैकेज को उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली है। इन प्रोत्साहनों के परिणामस्वरूप, 31 जुलाई 2026 तक एफ़सीएनआर (बी) स्वैप सुविधा के अंतर्गत कुल 36.725 बिलियन डॉलर प्राप्त हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, बॉण्ड बाज़ार में एफ़एआर के माध्यम से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफ़पीआई) का स्वस्थ अंतर्वाह देखा गया है। विदेशी मुद्रा का यह अंतर्वाह रुपये की स्थिरता का समर्थन करेगा और आयातित मुद्रास्फीति के प्रभाव को सीमित करने में मदद करेगा।

35. साथ ही, आरबीआई का उद्यम सर्वेक्षण बताता है कि इनपुट लागत दबाव बढ़ गया है और यह हेडलाइन सीपीआई आंकड़ों को प्रभावित करने लगा है। वैश्विक ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का प्रभाव- अंतरण कमर्शियल एलपीजी, औद्योगिक कच्चे माल, रसायन, रबर और प्लास्टिक उत्पादों जैसे कई क्षेत्रों में पहले से ही दिखाई दे रहा है। इसका पूरा असर आने वाले महीनों में ही देखने को मिलेगा।

36. हालाँकि अनुमानित आँकड़े एफ़आईटी दायरे के भीतर हैं, लेकिन 4% के लक्ष्य से अधिक के विचलन के महत्वपूर्ण होने और कई तिमाहियों तक बने रहने की आशा है। इस बिंदु पर, 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति 5.0 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो तीसरी में 5.9 प्रतिशत तक बढ्ने के अनुमान हैं और फिर चौथी तिमाही में कम होकर 5.5 प्रतिशत हो जाएगी। मुद्रास्फीति के इस प्रक्षेपपथ पर कड़ी नज़र रखने की आवश्यकता है। सीपीआई मुद्रास्फीति पर द्वितीय-दौर के प्रभाव की सीमा और डिग्री को समझने के लिए प्राप्त आँकड़े महत्वपूर्ण होंगे।

37. संवृद्धि के स्तर पर, अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय आघात-सहनीयता प्रदर्शित की है। एफ़एमसीजी की बिक्री, यात्री वाहनों और ट्रैक्टरों की बिक्री, घरेलू क्षेत्र को ऋण वृद्धि और क्रेडिट कार्ड से खर्च जैसे संकेतकों की एक विस्तृत श्रृंखला पर हालिया डेटा, अब तक घरेलू मांग की मजबूती को दर्शाते हैं।

38. वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के लिए निजी क्षेत्र के पूंजीगत व्यय के आंकड़े भी स्थावर संपदा और ऊर्जा सहित कई क्षेत्रों में उत्साहजनक हैं। निर्यात के स्तर पर, सेवाओं का निर्यात अच्छी स्थिति में है। अप्रैल-जून 2026 के दौरान वस्तु निर्यात में भी मजबूत वृद्धि जारी रही है। बैंक ऋण वृद्धि दर मजबूत संवृद्धि संभावनाओं को पुख्ता करती है। कुल मिलाकर, वित्त वर्ष 2027 में अर्थव्यवस्था के 6.7% की वास्तविक जीडीपी संवृद्धि दर्ज करने की उम्मीद है।

39. वर्तमान स्थिति में, मुद्रास्फीति-संवृद्धि गतिकी कुछ सवाल खड़े करती है। पहला, ध्यान देने योग्य व्यष्टि-आर्थिक चर वास्तविक ब्याज दर है, जिसका बचत और निवेश के निर्णयों पर प्रभाव पड़ता है। साथ ही, मूल मुद्रास्फीति (कीमती धातु सहित और उसे छोड़कर) के आंकड़ों के अनुसार, अर्थव्यवस्था में अति सक्रियता(ओवरहीटिंग) के अभी तक कोई संकेत नहीं हैं - कम से कम अभी के लिए हेडलाइन सीपीआई, आपूर्ति-पक्ष की परिघटना बनी हुई है। तीसरी समस्या यह है कि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर लगभग 7% है, जिसमें मांग-प्रेरित अति सक्रियता के कोई स्पष्ट संकेत नहीं हैं (जैसा कि मूल मुद्रास्फीति के आंकड़ों से संकेत मिलता है, जो अब तक लगातार हर तिमाही में 4% से नीचे रहे हैं), जो यह बताता है कि तटस्थ ब्याज दर के अनुरूप संभावित संवृद्धि दर 7% से काफी अधिक है। मौद्रिक नीति के दृष्टिकोण से इन सभी मुद्दों को समझना महत्वपूर्ण है। भावी आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे।

40. कुल मिलाकर, मौद्रिक नीति को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मुद्रास्फीति प्रत्याशाएं नियंत्रित रहें। हालाँकि, मौद्रिक नीति के कई प्रमुख संकेतकों पर अभी भी भारी अनिश्चितता मंडरा रही है। हालाँकि अर्थव्यवस्था ने अब तक संघर्ष के दुष्प्रभावों को सीमित प्रभाव के साथ झेल लिया है, लेकिन दबाव अब तेजी से दिखने लगे हैं। हमें बारीकी से नज़र रखनी होगी कि मुद्रास्फीति से जुड़े जोखिम — खाद्य मुद्रास्फीति और वैश्विक तेल की कीमतों पर अल नीनो का प्रभाव — सुलझते हैं या नहीं और कैसे सुलझते हैं। फिलहाल, मुद्रास्फीति की बदलती स्थिति के अनुसार आवश्यक अधिकतम परिचालनगत लचीलापन बनाए रखना उचित है। यदि बाह्य आघात और अधिक गंभीर हो जाते हैं या कीमतों पर पड़ने वाले अप्रत्यक्ष प्रभाव व्यापक रूप से फैलते हैं, तो हमें समष्टि-आर्थिक स्थिरता की रक्षा के लिए अपनी नीति में तुरंत संशोधन करने में सक्षम होना चाहिए।

41. तदनुसार, इस बैठक में भी, मैं नीतिगत रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने के लिए वोट करता हूँ और 'तटस्थ' रुख बनाए रखने का समर्थन करता हूँ।

श्री इंद्रनील भट्टाचार्य का वक्तव्य

42. 2026-27 की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने अस्थिर वैश्विक भू-राजनीतिक वातावरण, व्यापार संबंधी अनिश्चितताओं और अनिश्चित मानसून से उत्पन्न चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है। उच्च-आवृत्ति संकेतकों और शुरुआती कॉर्पोरेट परिणामों से संकेत मिलता है कि पहली तिमाही में औद्योगिक और सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में निरंतर गति बनी रही, जबकि पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन, निरंतर ऋण संवृद्धि और पूंजीगत व्यय पर सरकार के निरंतर जोर से निवेश में भी गति बनी रही। बाह्य स्तर पर, पहली तिमाही में वस्तुओं और सेवाओं के मजबूत निर्यात ने उच्च आयात के प्रभाव को कम किया। शहरी खपत स्थिर रही, जिसे एक वृद्धिशील सेवा क्षेत्र और स्थिर रोजगार का समर्थन प्राप्त था, लेकिन सामान्य से कम बारिश से कृषि उत्पादन को नुकसान पहुँचने और ग्रामीण खपत के कम होने का जोखिम है। हालाँकि कच्चे तेल की कीमतों में हाल ही में नरमी आई है, फिर भी यह संघर्ष में किसी भी अचानक वृद्धि के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनी हुई है। इन कारकों के आधार पर, 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि के अनुमान को जून की नीति से 10 बीपीएस बढ़ा दिया गया था।

43. 16 महीनों तक सौम्य और लक्ष्य के भीतर रहने के बाद, जून में हेडलाइन मुद्रास्फीति बढ़कर 4.4 प्रतिशत हो गई। हालाँकि 2026-27 के लिए मुद्रास्फीति के अनुमान को 10 बीपीएस कम कर दिया गया है, लेकिन इसमें स्पष्ट रूप से ऊर्ध्वगामी बढ़ोत्तरी हो रही है और अगले 9 महीनों (2026-27 की तीसरी तिमाही से 2027-28 की पहली तिमाही) के दौरान इसका औसत 5.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें आपूर्ति-पक्ष के आघातों से व्यापक अर्थव्यवस्था में दूसरे-दौर के प्रभाव पड़ने का खतरा है। मूल्य वृद्धि अस्थिर खाद्य और ईंधन श्रेणियों तक सीमित है; परिणामस्वरूप, उच्च निविष्टि लागत पहले ही सेवाओं, जैसे कि रेस्तरां, की कीमतों में झलकने लगी है। इस प्रकार, वर्ष के लिए मूल मुद्रास्फीति 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि कीमती धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति के चौथी तिमाही तक मूल मुद्रास्फीति के अनुरूप होने की संभावना है। आगे चलकर, अनियमित मॉनसून और अल-नीनो की बदलती परिस्थितियां वर्षा के वितरण और कृषि उपज के लिए सीधा खतरा उत्पन्न करती हैं। इसके अतिरिक्त, समय-समय पर होने वाले भू-राजनीतिक उथल-पुथल से वैश्विक तेल की कीमतों में तेज लेकिन अस्थिर उतार-चढ़ाव आ रहे हैं, जिससे निकट भविष्य की संभावना अस्पष्ट हो गई है। इन दोनों कारकों के मेल से खाद्य और ईंधन पर ऐसे झटके लग सकते हैं जो लंबे समय तक बने रह सकते हैं और अंततः व्यापक मुद्रास्फीति का कारण बन सकते हैं।

44. ऊपर बताई गई बातों के बावजूद, मैं निम्नलिखित कारणों से नीतिगत दर पर यथास्थिति बनाए रखने और तटस्थ रुख बनाए रखने के पक्ष में वोट देता हूँ। पहला, मुद्रास्फीति पूर्वानुमान, मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के ढांचे में एक सशर्त मध्यवर्ती लक्ष्य के तौर पर काम करता है।2 इसलिए, तेल की कीमतों जैसे अनुमान, जिन पर ये भविष्यवाणियां आधारित होती हैं, बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं, विशेषकर तब जब उनमें बहुत ज़्यादा उतार-चढ़ाव हो और वे भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर निर्भर हों। हालांकि मॉनसून से जुड़े जोखिम अभी भी बने हुए हैं, लेकिन अब तक खाद्य की कीमतों में बढ़ोतरी मामूली ही रही है। आने वाले महीनों में मॉनसून और खाद्य और ईंधन मुद्रास्फीति के प्रक्षेपपथ के बारे में अधिक स्पष्टीकरण मिलने की आशा है। इसलिए, उच्च अनिश्चितता वाले वातावरण में साक्ष्य पर आधारित नीति के महत्व को देखते हुए, मैं मुद्रास्फीति के आंकड़ों में इन जोखिमों के प्रभाव के दिखने की प्रतीक्षा करना बेहतर समझता हूँ।

45. दूसरा, खाद्य और ईंधन मुद्रास्फीति में आई तेजी का प्रभाव- अंतरण अब तक सीमित रहा है, जो यह संकेत देता है कि मुद्रास्फीति अभी तक व्यापक आधार वाली नहीं हुई है। जून-2026 के लिए सीपीआई प्रसार सूचकांक3 का उपयोग करके मापा गया वर्ष-दर-वर्ष हेडलाइन मुद्रास्फीति के घटकों का भारित वितरण दर्शाता है कि अधिकांश भारित वस्तुएं (69 प्रतिशत) अभी भी 4 प्रतिशत से कम या उसके बराबर मुद्रास्फीति प्रदर्शित कर रही हैं। हालांकि, वितरण का उच्च मुद्रास्फीति वाली संख्याओं की ओर होना सावधानीपूर्वक सतर्कता की मांग करता है। किसी भी दर वृद्धि पर विचार करने से पूर्व, यह देखना आवश्यक है कि मुद्रास्फीति कितनी व्यापक हो रही है और मुद्रास्फीति संबंधी प्रत्याशाओं पर अंकुश न लगाने का जोखिम कितना है।

46. एक अत्यंत अनिश्चित वातावरण में, आर्थिक एजेंटों के लिए नीति की भविष्य की दिशा के संबंध में किसी स्पष्ट अग्रिम मार्गदर्शन की तुलना में ढांचागत मार्गदर्शन अधिक हितकारी होता है। ढांचागत मार्गदर्शन को केंद्रीय बैंक के उद्देश्यों, निदान और प्रतिक्रिया कार्य के बारे में स्पष्ट संप्रेषण के रूप में परिभाषित किया गया है। ढांचागत मार्गदर्शन यह स्पष्ट करता है कि नीति, मांग और आपूर्ति के दबावों, स्थायी मुद्रास्फीति से अस्थायी मूल्य परिवर्तन, और वेतन एवं प्रत्याशाओं में व्यापक प्रसार से प्रत्यक्ष मूल्य प्रभावों के बीच कैसे अंतर करती है। प्रतिक्रिया कार्य – जो यह दर्शाता है कि मुद्रास्फीति की स्थिरता, प्रभाव- अंतरण और प्रत्याशाओं में परिवर्तन, नीति के समय और अंशांकन को कैसे प्रभावित करते हैं – यह नीति के उद्देश्य को समझने के लिए अधिक विश्वसनीय मार्गदर्शक है4। तदनुसार, जोर किसी एक आधारभूत ब्याज दर पथ से हटकर इस बात पर केंद्रित हो जाता है कि विभिन्न आर्थिक परिस्थितियों में नीति कैसे प्रतिक्रिया देगी5। इस दृष्टि से, विराम समय निर्धारण में लचीलापन बनाए रखता है; इसका तात्पर्य अनिवार्य रूप से दीर्घकालिक विराम से नहीं है।

डॉ. पूनम गुप्ता का वक्तव्य

47. जून 2026 में कुछ शमन के बाद, वैश्विक अनिश्चितताएं जुलाई में पुनः बढ़ गईं। तथापि, तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की कीमतों तथा उपलब्धता संबंधी संभावना में सुधार हुआ है। घरेलू स्तर पर, हाल के सप्ताहों में वर्षा की मात्रा और उसके वितरण में सुधार दर्ज किया गया है। जून में दर्ज हुई बड़ी कमी जुलाई के दौरान कम होने के साथ ही बुवाई की रफ़्तार बढ़ी है और जलाशयों के स्तर में वृद्धि हुई है। इसके अतिरिक्त, उच्च आवृत्ति वाले कई संकेतक लगातार आघात- सहनीयता और गतिशीलता प्रदर्शित कर रहे हैं, जो संवृद्धि की गति को बल प्रदान कर रहे हैं।

48. समष्टि रूप में, ये घटनाक्रम इस ओर संकेत करते हैं कि चालू वर्ष के दौरान संवृद्धि का परिणाम जून की मौद्रिक नीति में परिकल्पित अनुमान से कुछ बेहतर हो सकता है, जबकि मुद्रास्फीति मामूली रूप से कम रह सकती है। तदनुसार, वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) संवृद्धि का अनुमान अब 6.7 प्रतिशत लगाया गया है, जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति का अनुमान 5.0 प्रतिशत है। इसमें संवृद्धि के अनुमान में 10 आधार अंक (बीपीएस) का उधर्वमुखी संशोधन और मुद्रास्फीति के अनुमान में 10 आधार अंक का अधोगामी संशोधन किया गया है। दोनों ही पहलुओं पर जोखिम समान रूप से संतुलित माने जा रहे हैं।

49. ये अद्यतन प्रक्षेपण तेल मूल्यों के लिए संशोधित धारणाओं पर आधारित हैं। जबकि अप्रैल की मौद्रिक नीति में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और मुद्रास्फीति के पूर्वानुमानों के लिए तेल मूल्यों का औसत 85 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल और जून की नीति में इसे 95 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल माना गया था, वर्तमान परिस्थितियां वर्ष के लिए औसत तेल मूल्य में मामूली संशोधन की मांग करती हैं। तेल मूल्य वायदा बाजार के वर्तमान आकलन के आधार पर, यह उचित प्रतीत होता है कि वर्ष के दौरान तेल मूल्य औसतन लगभग 90 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहेंगे, जो जुलाई 2026 में आईएमएफ द्वारा प्रकाशित विश्व डबल्यूईओ के अद्यतन में की गई धारणा के निकट है।

50. उल्लिखित कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्तमान परिदृश्य में और ढील देने की कोई गुंजाइश नहीं दिखती है। इसके विपरीत, चूंकि वर्ष 2026-27 की तीसरी तिमाही में हेडलाइन मुद्रास्फीति 5.9 प्रतिशत तक के उच्च स्तर पर चरम पर पहुंचने का अनुमान है, वर्ष के दौरान दर वृद्धि की संभावना उत्पन्न हो सकती है।

51. मेरा मानना है कि वैश्विक घटनाक्रमों और मौसम से जुड़े जोखिमों के कारण बनी हुई अनिश्चितताओं को देखते हुए, सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि थोड़ी और प्रतीक्षा की जाए और देखा जाए। इससे मौसम संबंधी अनिश्चितताओं के पूर्णतः शांत होने, आपूर्ति पक्षीय मुद्रास्फीति के कितनी सीमा तक सुदृढ़ होने का आकलन करने और वैश्विक स्तर पर कुछ और स्पष्टता प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।

52. अतः, मैं यथास्थिति बनाए रखने, अर्थात नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने के पक्ष में वोट देती हूँ। मैं रुख को तटस्थ बनाए रखने का भी प्रस्ताव करती हूँ, जिससे यह संकेत मिले कि भविष्य में नीतिगत कार्रवाई डेटा पर आधारित होनी चाहिए।

श्री संजय मल्होत्रा का वक्तव्य

53. यद्यपि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हुई हैं, अनिश्चितता बढ़ी है और अब तक मानसून अनियमित रहा है, फिर भी भारतीय अर्थव्यस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में अपेक्षाओं से बेहतर प्रदर्शन किया है। आगे भी अर्थव्यस्था में आघात सहनीयता बने रहने की संभावना है। मौजूदा प्रतिकूल परिस्थितियों को देखते हुए, इस वित्त वर्ष के लिए अनुमानित 6.7 प्रतिशत की संवृद्धि मजबूत मानी जा सकती है। मुद्रास्फीति में धीरे-धीरे वृद्धि हो रही है। अनुमान है कि यह तीसरी तिमाही में अपने शिखर पर पहुंचेगी, उसके बाद इसमें कमी आएगी, और इस वित्त वर्ष में यह औसतन पांच प्रतिशत रहने का अनुमान है। संवृद्धि - मुद्रास्फीति की गतिशीलता लगभग वैसी ही है जैसे कि पिछली मौद्रिक नीति बैठक में थी।

54. आपूर्ति पक्ष के झटके के प्रति मौद्रिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता तभी होती है जब इसके परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण, मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं पर अंकुश नहीं लगाना (डी-एंकरिंग) या सतत मुद्रास्फीति के संकेत मिलें। यद्यपि जोखिम बने हुए हैं, परंतु अब तक इसका साक्ष्य सीमित है। जैसा कि जून की बैठक में तर्क दिया गया था, उच्च हेडलाइन मुद्रास्फीति मुख्य रूप से आपूर्ति पक्ष के झटकों के कारण है; यह प्रायः उच्च खाद्य और ईंधन मूल्यों से संचालित है; और मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण के सीमित संकेत हैं, जबकि मुख्य मुद्रास्फीति मध्यम बनी हुई है। मुद्रास्फीति प्रत्याशाएँ भी, यद्यपि थोड़ी अधिक हैं, परंतु नियंत्रित हैं। इसके अतिरिक्त, तीसरी तिमाही में अपने शीर्ष स्तर से मुद्रास्फीति के धीरे-धीरे कम होने की अपेक्षा है। अतः वर्तमान में मांग को नियंत्रित करने के लिए इस झटके के प्रति मौद्रिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं है।

55. इसके बावजूद, मुद्रास्फीति के अब तक देखे गए सुगम स्तरों से सामान्य होने के संकेत मिल रहे हैं। पिछले वर्ष औसत मुद्रास्फीति केवल दो प्रतिशत थी, जब नीतिगत ब्याज दर को घटाकर 5.25 प्रतिशत किया गया था। न केवल चालू वर्ष में हेडलाइन मुद्रास्फीति पहले से ही औसतन 3.93 प्रतिशत रही है, बल्कि कीमती धातुओं को छोड़कर मूल भी चालू वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में मूल मुद्रास्फीति के साथ अभिसरण करने की संभावना है, जो 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह नीतिगत ब्याज दर के पुनर्अंशांकन का संकेत दे सकता है।

56. तथापि, नीतिगत रेपो दर में किसी भी पुनर्अंशांकन के लिए, मैं वास्तविक मुद्रास्फीति के आंकड़ों के इन या उच्च स्तरों पर बने रहने की स्थायित्व, पूर्वानुमान और उस संभावित स्तर तक जिस पर मुद्रास्फीति सामान्य होकर स्थिर हो सकती है, के संदर्भ में मुद्रास्फीति की प्रवृत्ति के बारे में अधिक स्पष्टता उभरने की प्रतीक्षा करना उचित समझता हूँ। हमें इस बात के प्रति सतर्क भी रहने की आवश्यकता है कि खाद्य, ईंधन और अन्य इनपुट की ऊंची कीमतों के व्यापक स्तर पर मुद्रास्फीति में वृद्धि और प्रत्याशाओं पर अंकुश नहीं लगाने में परिवर्तित होने का जोखिम बना हुआ है। इन जोखिमों के वास्तविक रूप लेने का कोई भी साक्ष्य, नीतिगत सख्ती की आवश्यकता उत्पन्न कर सकता है।

57. इन विचारों को ध्यान में रखते हुए, मैं नीतिगत रेपो दर को यथावत रखने और तटस्थ रुख बनाए रखने के पक्ष में वोट करता हूँ।

(ब्रिज राज)   
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/925


1 जनवरी-फरवरी 2026 के दौरान ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें औसतन लगभग 67 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहीं। इसके बाद इनमें तीव्र ऊर्ध्वमुखी दबाव देखा गया और कीमतें 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँचने के उपरांत 80–90 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के दायरे में स्थिर हुईं।

2 स्वेन्सन, एल ई ओ (1997), "इन्फ़्लेशन फोरकास्ट टार्गेटिंग: इम्प्लेमेंटिंग एंड मॉनिटरिंग इन्फ़्लेशन टारगेट्स, यूरोपियन इकोनोमिक रीव्यू 41 (6): 1111–1146

3 मुद्रास्फीति प्रसार सूचकांक यह मापता है कि किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं एवं सेवाओं की विभिन्न श्रेणियों में मूल्यवृद्धि कितनी व्यापक रूप से फैल रही है। मूल्य परिवर्तनों के औसत परिमाण को मापने के स्थान पर यह उन वस्तुओं अथवा क्षेत्रों के प्रतिशत का आकलन करता है जिनमें कीमतों में वृद्धि दर्ज की जा रही है। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि मुद्रास्फीति केवल कुछ सीमित वस्तुओं तक सीमित है अथवा मुद्रास्फीति के मापन हेतु प्रयुक्त समूची पण्य समूह में व्यापक रूप से व्याप्त है। (संदर्भ:भारतीय अर्थव्यवस्था पर डेटाबेस, भारतीय रिज़र्व बैंक)

4 क्युरे, बी. (2018), "फॉरवर्ड गाइडेंस एंड पॉलिसी नॉर्मलाइज़ेशन", डॉयचेस इंस्टीट्यूट फ़्यूर वीर्टशाफ्ट्सफ़ोर्शुंग, बर्लिन में 17 सितंबर को दिया गया भाषण।

5 बेल, एस., चावाज़, एम., होफ़मान, बी., रीस, डी. एवं रॉटनर, एम. (2026) "इवोल्विंग एप्रोचेस टू मोनेटरी पॉलिसी कम्यूनिकेशन इन दि फेस ऑफ अनसर्टेनिटी: फेन चार्ट्स, सिनेरिओज़ एंड गाइडेंस,'' बीआईएस क्वार्टर्ली रीव्यू, मार्च।

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