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मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2026-27 मौद्रिक नीति समिति का संकल्प 5 से 7 अक्तूबर 2026

7 अक्तूबर 2026

मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2026-27 मौद्रिक नीति समिति का संकल्प 5 से 7 अक्तूबर 2026

मौद्रिक नीति निर्णय

श्री संजय मल्होत्रा, गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक की अध्यक्षता में मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 63वीं बैठक 5 से 7 अक्तूबर 2026 तक आयोजित की गई। बैठक में एमपीसी के सदस्य डॉ. नागेश कुमार, श्री सौगत भट्टाचार्य, प्रो. राम सिंह, डॉ. पूनम गुप्ता और श्री इंद्रनील भट्टाचार्य ने भाग लिया।

2. उभरते समष्टि-आर्थिक और वित्तीय घटनाक्रमों तथा संभावना का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद, एमपीसी ने चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत नीतिगत रेपो दर को 25 आधार अंकों (बीपीएस) से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने के लिए सर्वसम्मति से वोट किया। परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5.25 प्रतिशत, तथा सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) दर और बैंक दर 5.75 प्रतिशत पर बनी रहेगी। एमपीसी ने मौद्रिक रुख को सुविचारित सख्ती (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) रुख में बदलने का भी निर्णय लिया।

संवृद्धि एवं मुद्रास्फीति संभावना

वैश्विक संभावना

3. अगस्त 2026 में आयोजित पिछली एमपीसी बैठक के बाद से, पश्चिम एशिया में संघर्ष पुनः आरंभ होने और इसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी अस्थिरता ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अनिश्चितता में रखा है। वैश्विक संवृद्धि आघात-सह बनी रही है। प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति में बढ़ोत्तरी के कारण सख्त मौद्रिक नीति की ओर रुख हुआ है। अमेरिकी फेड ने सितंबर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी की। इसके बाद फेड के वक्तव्य और प्रमुख प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण केंद्रीय बैंकों द्वारा दरों में सख्ती के कारण वैश्विक नीतिगत दरों में और बढ़ोतरी की प्रत्याशाएं मजबूत हुई हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में कड़े हालात और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में राजकोषीय स्थिरता की चिंताओं के कारण वैश्विक बॉण्ड प्रतिफल उच्च स्तर पर बने हुए हैं। पश्चिम एशिया के संघर्ष का कोई समाधान न निकलने के कारण, वैश्विक संभावना के लिए महत्वपूर्ण अधोगामी जोखिम बने हुए हैं, जिनमें वैश्विक वित्तीय स्थितियों का और अधिक सख्त होना, एआई-संबंधी आस्तियों का उच्च मूल्यन जारी रहना और उच्च सार्वजनिक ऋण शामिल हैं।

घरेलू संभावना

4. इन निरंतर वैश्विक बाधाओं के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था आघात-सह बनी हुई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अनुमानों के अनुसार, 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही, जो उम्मीद से अधिक थी। मजबूत निजी उपभोग और स्थिर निवेश, वस्तु निर्यात में सुधार और सेवा निर्यात में निरंतर तेजी ने संवृद्धि को समर्थन दिया। आपूर्ति पक्ष पर, विनिर्माण क्षेत्र में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। घरेलू और बाहरी मांग में तेजी के कारण सेवा क्षेत्र की गतिविधियां और अधिक मजबूत हुईं।

5. दूसरी तिमाही में, जुलाई-अगस्त के लिए उपलब्ध उच्च-आवृत्ति संकेतक घरेलू आर्थिक गतिविधि में निरंतर गति का संकेत देते हैं। घरेलू मांग आघात-सह बनी हुई है और मजबूत बाहरी मांग द्वारा सुसमर्थित है, जिसमें वस्तु निर्यात में दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है।

6. आगे चलकर, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता का घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव जारी रहेगा। यद्यपि ऊर्जा की कीमतें और आपूर्ति शृंखला का दबाव बना हुआ है, तथापि पश्चिम एशिया के चल रहे संघर्ष के बीच इनका निकटवर्ती रुख अनिश्चित है। आपूर्ति स्रोतों में सक्रिय विविधता लाकर उनके प्रतिकूल प्रभाव को नियंत्रित किया जा रहा है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी और मजबूत अल नीनो स्थितियां कृषि क्षेत्र की संभावना और ग्रामीण मांग के लिए जोखिम उत्पन्न करती हैं, हालांकि खाद्यान्न के पर्याप्त बफर और सरकार के सक्रिय नीतिगत हस्तक्षेपों से प्रभाव कम होने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, सेवाओं में निरंतर गति और व्यापक रूप से स्थिर रोजगार की स्थिति से शहरी मांग को समर्थन मिलने की संभावना है। मजबूत क्षमता उपयोग, मजबूत ऋण प्रवाह और अवसंरचना पर सरकार के जोर से निवेश गतिविधि को बनाए रखने की उम्मीद है। हालांकि सेवाओं के निर्यात के तेज बने रहने की उम्मीद है, लेकिन द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को वस्तु निर्यात को बढ़ावा देना होगा।

7. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की संवृद्धि दर 7.1 प्रतिशत अनुमानित है, जोकि दूसरी तिमाही में 7.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। 2027-28 की पहली तिमाही के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि 7.1 प्रतिशत अनुमानित है। जोखिम समान रूप से संतुलित हैं (चार्ट 1)।

8. अगस्त 2026 में सीपीआई मुद्रास्फीति जुलाई के 4.5 प्रतिशत से बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई। हालांकि यह वृद्धि मुख्य रूप से खाद्य और ईंधन समूहों में उच्च मुद्रास्फीति के कारण हुई है, लेकिन मूल मुद्रास्फीति भी बढ़ी है जो मूल्य दबावों के व्यापक होने के संकेत देती है। चीनी और प्याज जैसी कुछ वस्तुओं में उल्लेखनीय उछाल के साथ खाद्य कीमतों में वृद्धि अधिक व्यापक हो गई है। अगस्त में ईंधन मुद्रास्फीति में वृद्धि मुख्य रूप से प्रतिकूल आधार प्रभाव के कारण थी। अगस्त में मूल मुद्रास्फीति बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई और कीमती धातुओं को छोड़कर मूल मुद्रास्फीति 2.9 प्रतिशत हो गई। हेडलाइन सीपीआई में 4 प्रतिशत से अधिक मुद्रास्फीति दर्ज करने वाली वस्तुओं का भारित हिस्सा अगस्त में लगातार बढ़कर लगभग 37 प्रतिशत हो गया।

9. मुद्रास्फीति संबंधी सन्निकट संभावना से संकेत मिलता है कि मानसून में कमी, चल रहे अल-नीनो की स्थिति और उच्च ऊर्जा तथा अन्य वस्तुओं की कीमतों के कारण आपूर्ति पक्ष से दबाव जारी रहेगा, जिनका प्रभाव-विस्तार अभी भी जारी है। सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, वर्ष 2026-27 के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति 5.2 प्रतिशत अनुमानित है, जोकि दूसरी तिमाही में 4.9 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.0 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहना अनुमानित है (चार्ट 2)। वित्त वर्ष 2027-28 की पहली तिमाही के लिए मुद्रास्फीति 5.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है और जोखिम समान रूप से संतुलित हैं। 2026-27 के लिए मूल मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

Chart 1 and 2

मौद्रिक नीति निर्णय का औचित्य

10. एमपीसी ने कहा कि भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण वैश्विक परिस्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। फिर भी, भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। आर्थिक गति व्यापक बनी हुई है। अर्थव्यवस्था आघात-सह बने रहने की अपेक्षा है।

11. उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर, यह स्पष्ट है कि मुद्रास्फीति और उसकी संभावना पिछले वर्ष की तरह अनुकूल नहीं है, क्योंकि अगली तीन तिमाहियों में हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति औसतन लगभग 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है और इस वर्ष मूल मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इस स्थिति में, नीतिगत दर का पुनर्सामायोजन करना अनिवार्य है।

12. आपूर्ति पक्ष की मुद्रास्फीति के संबंध में, मौद्रिक नीति मुख्य रूप से द्वितीयक प्रभावों (मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं और फर्म स्तर के मूल्य निर्धारण व्यवहार आदि) को कम करके काम करती है, जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से सामने आने में समय लगता है और उपलब्ध डेटा से अलग करना कठिन होता है। मुद्रास्फीति की प्रत्याशाओं और फर्म स्तर के मूल्य निर्धारण व्यवहार से संबंधित डेटा के अलावा, इस उद्देश्य के लिए मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण के संकेतक जैसे मूल मुद्रास्फीति और प्रसार सूचकांक का उपयोग किया जाता है। यद्यपि, यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि द्वितीय-चरण के प्रभावों और आपूर्ति पक्ष के दबावों (ऊर्जा तथा अन्य इनपुट के माध्यम से उत्पादन लागत में) के अप्रत्यक्ष प्रभाव के बीच अंतर करना कठिन है, क्योंकि ये दोनों ही इन संकेतकों में उपस्थित हैं। यद्यपि बढ़ी हुई मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं और मुद्रास्फीति के सामान्यीकरण के कुछ प्रमाण हैं, तथापि मूल्य निर्धारण व्यवहार में आपूर्ति पक्ष के दबावों के समाहित होने के संकेत सीमित ही हैं।

13. इसी प्रकार, यद्यपि मांग पक्ष के दबाव के सीमित प्रमाण हैं, तथापि मौद्रिक और ऋण समुच्चय में मजबूत संवृद्धि के मद्देनजर जोखिम मौजूद हैं।

14. इन सभी कारकों पर विचार करते हुए, एमपीसी ने नीतिगत रेपो दर को 25 आधार अंकों से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने के लिए सर्वसम्मति से वोट किया। एमपीसी ने रुख को सुविचारित सख्ती (कैलिब्रेटेड टाइटनिंग) में बदलने का भी निर्णय लिया। यह केवल यह संकेत देता है कि मौजूदा स्थितियों को देखते हुए, निकट अवधि में दरों में कटौती की कोई गुंजाइश नहीं है और आगे की नीतिगत कार्रवाई केवल दरों में वृद्धि या ठहराव हो सकती है, जो बदलती परिस्थितियों और संभावना पर निर्भर करता है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी का चक्र कितना लंबा होगा और इसका दायरा क्या होगा, यह वास्तविक संवृद्धि और मुद्रास्फीति के रुझानों तथा संभावना पर निर्भर करेगा, विशेष रूप से अंतर्निहित मुद्रास्फीति, मूल्य दबावों के विस्तार और आपूर्ति झटके के दूसरे दौर के प्रभावों के साथ-साथ मांग के आवेगों के प्रभाव पर।

15. दो सदस्यों, डॉ. नागेश कुमार और प्रोफ़ेसर राम सिंह, का यह विचार था कि रुख को तटस्थ रखा जाना चाहिए।

16. एमपीसी मूल्य स्थिरता के अपने अधिदेश के प्रति प्रतिबद्ध है और मुद्रास्फीति को अपने लक्ष्य के साथ क्रमिक रूप से संरेखित करने का प्रयास करेगी।

17. एमपीसी की बैठक का कार्यवृत्त 21 अक्तूबर 2026 को प्रकाशित किया जाएगा।

18. एमपीसी की अगली बैठक 2 से 4 दिसंबर 2026 को निर्धारित है।

(ब्रिज राज)   
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/1264

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