23 अक्तूबर 2026
आरबीआई बुलेटिन – अक्तूबर 2026
रिज़र्व बैंक ने आज अपने मासिक बुलेटिन का अक्तूबर 2026 का अंक जारी किया। इस बुलेटिन में दो भाषण, चार आलेख और वर्तमान सांख्यिकी शामिल हैं।
उक्त चार आलेख हैं: I. अर्थव्यवस्था की स्थिति; II. एससीबी की ऋण दरों में संचरण: डब्ल्यूएएलआर में मूल्य प्रभाव बनाम संरचना प्रभाव; III. एनबीएफसी क्षेत्र का कार्यनिष्पादन: वर्ष 2025 की समीक्षा; और IV. रात्रिकालीन प्रकाश और गूगल ट्रेंड्स की सहायता से भारत में राज्य-स्तरीय आर्थिक गतिविधियों की नाउकास्टिंग
I. अर्थव्यवस्था की स्थिति
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक संघर्षों के नए सिरे से बढ़ने और आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों के कारण मुद्रास्फीति संबंधी दबाव बढ़े हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा नीतिगत दर में वृद्धि की गई। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं (एई) के सॉवरेन बॉण्ड प्रतिफल में वृद्धि से राजकोषीय संधारणीयता और वित्तीय स्थिरता पर इसके प्रभावों को लेकर भी चिंताएँ बढ़ी हैं। उद्योग और सेवा, दोनों क्षेत्रों के उच्च-आवृत्ति संकेतकों से स्पष्ट है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी सुदृढ़ता बनाए रखी। सितंबर में हेडलाइन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक(सीपीआई) मुद्रास्फीति में मामूली वृद्धि दर्ज की गई, जिसका प्रमुख कारण खाद्य पदार्थों, ईंधन और कोर घटकों की कीमतों में व्यापक वृद्धि थी। वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले छह महीनों के दौरान वस्तु निर्यात में दोहरे अंकों की वृद्धि से व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिली। अगस्त में एफडीआई, ईसीबी और विप्रेषण प्रवाह में मजबूती आई। एफसीएनआर (बी) स्वैप विंडो के अंतर्गत पर्याप्त प्रवाह से विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि हुई।
II. एससीबी की ऋण दरों में संचरण: डब्ल्यूएएलआर में मूल्य प्रभाव बनाम संरचना प्रभाव
लेखक: युवराज कश्यप, कमल गुप्ता और अरविंद झा
यह आलेख अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की नई ऋण दरों तक मौद्रिक नीति के संचरण का विश्लेषण करता है। इसमें भारित औसत उधार दर (डब्ल्यूएएलआर) में होने वाले परिवर्तनों को ब्याज दर प्रभाव और संरचना प्रभाव में विभाजित किया गया है। बैंक और क्षेत्र स्तर पर ऋण दरों तथा ऋण भारांशों के लिए सूचकांक-आधारित रूपरेखा का उपयोग करते हुए, यह अध्ययन इस बात की जाँच करता है कि समग्र डब्ल्यूएएलआर में परिवर्तन किस सीमा तक ऋण दरों में बदलाव और ऋण संरचना में परिवर्तन को प्रतिबिंबित करते हैं।
मुख्य बातें:
-
नीतिगत रेपो दर में कुल 125 आधार अंकों (बीपीएस) की कटौती के कारण, फरवरी 2025 से मार्च 2026 के दौरान नए ऋणों पर डब्ल्यूएएलआर में 93 बीपीएस की गिरावट आई। इसमें ब्याज दर प्रभाव 80 बीपीएस और संरचना प्रभाव 13 बीपीएस रहा।
-
समग्र डब्ल्यूएएलआर में होने वाले परिवर्तन ऋणों के पुनर्निर्धारण के साथ-साथ बैंकों और क्षेत्रों के बीच ऋण संरचना में होने वाले बदलावों को भी दर्शाते हैं जो कि मौद्रिक नीति के संचरण का आकलन करते समय दोनों प्रभावों को ध्यान में रखने के महत्त्व को रेखांकित करता है।
III. एनबीएफसी क्षेत्र का कार्यनिष्पादन: वर्ष 2025 की समीक्षा
लेखक: पल्लवी पंत, मोनालिसा पाओली, अभ्युदय हर्ष, बृजेश पी. और सोना चिन्गैह्लियन
यह आलेख दिसंबर 2025 के अंत तक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) क्षेत्र के कार्यनिष्पादन का आकलन करता है। इसमें भारत की वित्तीय प्रणाली का समग्र परिदृश्य भी प्रस्तुत किया गया है। टेक्स्ट-माइनिंग पद्धति का उपयोग करते हुए, यह लेख चुनिंदा एनबीएफसी द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को अपनाने की दिशा और उसके स्वरूप का भी विश्लेषण करता है।
मुख्य बातें:
-
दिसंबर 2025 के अंत में एनबीएफसी क्षेत्र की ऋण वृद्धि में वर्ष-दर-वर्ष आधार पर दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज होती रही।
-
बैंक उधार का हिस्सा मध्यम रूप से बढ़ा, जो वित्तपोषण संरचना में निरंतर संकेंद्रण का संकेत देता है। हाल के वर्षों में एनपीए अनुपात में लगातार गिरावट से स्पष्ट है कि इस क्षेत्र की आस्ति गुणवत्ता में सुधार जारी रहा है।
-
प्रारंभिक टेक्स्ट-माइनिंग विश्लेषण से पता चलता है कि एनबीएफसी ग्राहक सेवाओं और वित्तीय एप्लिकेशन, अभिशासन, डिजिटल अवसंरचना तथा डेटा विश्लेषिकी हेतु एआई का उपयोग तेजी से बढ़ा रही हैं।
IV. रात्रिकालीन प्रकाश और गूगल ट्रेंड्स की सहायता से भारत में राज्य-स्तरीय आर्थिक गतिविधियों की नाउकास्टिंग
लेखक: बिपुल घोष, नरेंद्र सिंह और संध्या कुरुगंती
भारत में राज्य-स्तरीय आर्थिक गतिविधियों का समयोचित मापन अभी भी एक चुनौती बना हुआ है, क्योंकि योजित सकल राज्य मूल्य (जीएसवीए) संबंधी आधिकारिक आँकड़े पर्याप्त विलंब के साथ वार्षिक आधार पर जारी किए जाते हैं। यह अध्ययन दर्शाता है कि किस प्रकार वैकल्पिक डेटा स्रोतों, विशेष रूप से उपग्रह-आधारित रात्रिकालीन प्रकाश और डिजिटल-सर्च व्यवहार का उपयोग करके राज्य-स्तरीय आर्थिक गतिविधियों के उच्च-आवृत्ति अनुमान तैयार किए जा सकते हैं। इस रूपरेखा को तीन प्रमुख राज्यों- महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात पर लागू किया गया है। यह रेखांकित करता है कि भू-स्थानिक और व्यवहार संबंधी डेटा का संयोजन क्षेत्रीय आर्थिक गतिशीलता का वास्तविक समय का दृश्य प्रदान कर सकता है और अल्पकालिक आर्थिक मूल्यांकन को बेहतर बना सकता है।
मुख्य बातें
-
रात्रिकालीन प्रकाश और गूगल ट्रेंड्स का संयुक्त उपयोग, एकल-चर आधारित पद्धति की तुलना में, तिमाही जीएसवीए वृद्धि के नाउकास्ट की सटीकता को बेहतर बनाता है।
-
यह पद्धति राज्य-स्तरीय अर्थव्यवस्थाओं की तात्कालिक निगरानी करने में सक्षम बनाती है, जिससे निर्णायक बिंदुओं और आकस्मिक आघातों का शीघ्र पता लगाने में मदद मिलती है।
-
यह पद्धति मापनीय है और आधिकारिक सांख्यिकी प्रणालियों के पूरक के रूप में तथा उच्च-आवृत्ति वाले व्यापक आर्थिक विश्लेषण में वैकल्पिक डेटा की क्षमता को प्रदर्शित करती है।
बुलेटिन के आलेखों में व्यक्त विचार लेखकों के हैं और ये भारतीय रिज़र्व बैंक के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
(ब्रिज राज)
मुख्य महाप्रबंधक
प्रेस प्रकाशनी: 2026-2027/1381 |